भारतीय इतिहास में शायद पहली बार ही ऐसा
हुआ होगा जब देश में किसी दोषी को सजा सुनाने के लिए जज हेलिकॉप्टर से कोर्ट
पहुंचे हों. हरियाणा की राजनीती में बेहद प्रभाव रखने वाले डेरा सच्चा सौदा के
प्रमुख गुरमीत राम रहीम को रेप के मामले में दोषी ठहराकर स्पेशल सीबीआई कोर्ट के
जज जगदीप सिंह ने हरियाणा ही नहीं पूरे देश में एक मिसाल कायम कर सनसनी मचा दी थी.
दोषी करार दिए जाने के साथ ही हरियाणा ही नहीं देश के राज्यों में राम रहीम के
समर्थकों ने भारी उत्पात मचाया था जिसमें 40 लोगों की जान चली गई थी और करोड़ों की
सरकारी-गैर सरकारी सम्पति का नुकसन हुआ था. एक ऐसे शख्स को सजा सुनाना जिसके आगे
राजनीति के बड़े-बड़े दिग्गज आकर सिर झुकाते हों और सर्कार उसके इशारे पर
उठती-बैठती हो. वो कानून व्यवस्था के लिए चुनौती बन जाए कोई आसान काम नहीं था.
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| जस्टिस जगदीप सिंह |
17 जनवरी 2019 का दिन भी कुछ ऐसा ही था
जिसका इंतजार देश के नागरिकों से लेकर कानून व्यवस्था से सम्बन्ध रखने वाले हर
व्यक्ति को था. इस दिन का इंतजार हर शक्स ने पूरे 16 साल तक बड़ी बेसब्री से किया
था. सिरसा से प्रकाशित साप्ताहिक ‘’पूरा सच्च’’ समाचार पत्र के सम्पादक पत्रकार
राम चन्द्र छत्रपति की हत्या के आरोप में डेरा सच्चा सौदा के डेरामुखी गुरमीत
रामरहीम व तीन अन्य लोगों को पंचकुला की विशेष सीबीआई अदालत ने 17 जनवरी 2019 को
सज़ा सुना दी थी. उल्लेखनीय है कि देशभर की नजरों में आए
छत्रपति हत्याकांड मामले की सुनवाई लंबे समय से पंचकूला की विशेष सीबीआई अदालत में
चल रही थी. मामले में फाइनल बहस की प्रक्रिया पूरी होते ही 11 जनवरी को इस मामले
से जुड़े चारों आरोपियों को दोषी करार देने के बाद फैसले के लिए 17 तारीख तय की गई
थी. यह एक ऐसा मामला है, जिसमें एक बार फिर गुरमीत रामरहीम की मुश्किलें बढ़ सकती थी. इसके
अलावा रणजीत हत्याकांड भी दूसरा ऐसा मामला है, जिसपर सुनवाई का दौर अंतिम चरण में है. डेरा सच्चा सौदा से जुड़ा एक
और बड़ा मामला डेरा के 400 साधुओं को नपुंसक बनाने का भी विचाराधीन है. डेरा मुखी को पिछले साल
साध्वी यौन शोषण मामले में सजा हो चुकी है.
अपना फैसला सुनाने के दौरान विशेष सीबीआई
अदालत के जस्टिस जगदीप सिंह का कहना था.
सज़ा सुनाते वक्त जज साहब ने कहा
‘’एक
निर्भीक पत्रकार की हत्या सिर्फ इस लिए कर दी गई क्योंकि उस ने ताकतवर के खिलाफ सच
लिखने की हिम्मत दिखाई. एक मासूम नागरिक और एक आदर्शवादी-निर्भीक पत्रकार की हत्या
इसलिए कर दी गई कि उसने किसी डेरे के ताकतवर प्रमुख की गतिविधियों को सच लिखने की
हिम्मत दिखाई. आधुनिक देश में चौथे स्तंभ के तौर पर पहचाना जाने वाला मिडिया
लोकतंत्र की निगरानी करता है. मिडिया बड़े पैमाने पर आम राय को प्रभावित करने की
क्षमता के कारण किसी व्यक्ति, सन्गठन या संस्था को बना या मिटा भी सकता है. पत्रकारिता
बहुत ही गम्भीर कारोबार है. इससे जुड़े लोग समाज, देश और दुनियां की बेहतरी के लिए
सच को खंगाल कर रिपोर्ट पेश करते हैं. इस पेशे में मामूली ग्लैमर है. इसकी ऐवज में
पत्रकारों को कुछ खास हासिल भी नहीं होता. पारम्परिक तौर पर यह गम्भीर संवेदना के
साथ जनसेवा का काम है .दोषियों ने एक पत्रकार की हत्या कर जघन्य और घृणित अपराध
किया है जिसमे क्षमा की दूर-दूर तक गुंजायश नहीं है.’’
डेरामुखी गुरमीत राम रहीम और तत्कालीन डेरा प्रबंधक कृष्ण लाल को आईपीसी की धारा 120बी (आपराधिक साजिश रचने) और 302 के तहत मुल्जिम करार दिया गया, जबकि कारपेंटर कुलदीप सिंह तथा कारपेंटर निर्मल सिंह को आईपीसी की धारा 302 ( हत्या की सजा) और 120बी (आपराधिक साजिश) का दोषी करार दिया गया था. निर्मल सिंह को आर्म्स एक्ट 1959 के सेक्शन 25 तथा कृष्ण लाल को आर्म्स एक्ट 1959 के सेक्शन 29 के तहत भी दोषी करार देकर उम्रकैद की सजा के साथ-साथ सभी दोषियों पर 50-50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया.
सीबीआई के अधिवक्ताओं, छत्रपति के परिवार और डेरा प्रमुख के बीच चार घंटों तक बहस चली. इसके दो घंटों के बाद फैसला सुनाया गया. सजा पर बहस के दौरान सीबीआई ने राम रहीम के लिए मौत की सजा की मांग की थी, लेकिन उसके वकील ने उसकी धार्मिक कामों का कोर्ट में हवाला दिया. बता दें कि मारे गए पत्रकार के परिवार ने दोषियों को मृत्युदंड दिए जाने की मांग की थी. जज साहब ने यह सज़ा विसि के जरिये सुनाई थी. मामले में सीबीआई के पास 46 गवाह थे, जबकि बचाव पक्ष की और से 21 गवाह पेश किए गए थे. हत्या के चश्मदीद गवाह के रूप में मृतक रामचन्द्र के बेटे अंशुल और अदिरमन थे. जिन्होंने कोर्ट में आंखों देखी ब्यां की थी. इसके अलावा हत्या के षड्यंत्र के बारे में गवाह खट्टा सिंह ने कोर्ट में बयान दिए थे. साथ ही डाक्टरों की भी गवाहियां हुई थी. बचाव पक्ष की दलीलें थी कि राम रहीम का पहली बार 2007 में केस में सामने आया था. साथ ही किसी भी आरोपित की पहचान नहीं हुई थी. पूरे मामले की जांच डीएसपी सतीश डागर और डीआइजी एम नारायणन ने की थी. कोर्ट में केस को साबित करने के लिए एडवोकेट एचपीएस वर्मा ने कोई कसर नहीं छोड़ी. सीबीआइ ने चश्मदीदों के अलावा कोर्ट में यह भी साबित किया कि जिस रिवाल्वर से रामचंद्र को गोली मारी गई थी, वह आरोपित किशन लाल की लाइसेंसी रिवाल्वर थी. किशन लाल ने 23 अक्टूबर को यह रिवाल्वर आरोपित निर्मल सिंह और कुलदीप को दी थी. इस तथ्य को सीबीआइ ने ब्लेस्टिक एक्सपर्ट से भी कोर्ट में साबित करवाया. एक्सपर्ट ने कोर्ट में बताया था कि गोली उसी रिवाल्वर से चली थी, जोकि किशन लाल के नाम पर रजिस्टर्ड थी. हर गवाह की गवाही काफी मायने रखती थी, लेकिन छत्रपति के परिवार ने लंबा संघर्ष किया. रामचंद्र छत्रपति के बेटे अंशुल ने कहा था दोषी गुरमीत राम रहीम का केस में बहुत ही प्रभाव था और हम मांग करते हैं कि दोषी बाबा गुरमीत राम रहीम को फांसी की सज़ा हो.
पूरा मामला इस प्रकार था
पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति हत्याकांड करीब
16
साल पुराना है और डेरामुखी गुरमीत रामरहीम इसमें आरोपी थे. साल 2002 में पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी.
छत्रपति अपने समाचार पत्र ‘’पूरा सच’’ में डेरा से जुड़ी खबरों को प्रकाशित करते
थे. पत्रकार छत्रपति के परिजनों ने मामला दर्ज करवाया था और बाद में इसे सीबीआई के
सुपुर्द कर दिया गया था. सीबीआई ने 2007 में चार्जशीट दाखिल कर दी थी और इसमें डेरा प्रमुख गुरमीत सिंह राम
रहीम को हत्या की साजिश रचने का आरोपी माना गया था. फ़िलहाल
डेरा मुखी साध्वियों के साथ रेप मामले में रोहतक की
सोनारिया जेल में 20 साल की सजा काट रहा हैं. छत्रपति मामले में दी गई डेरा मुखी को दी गई सज़ा साध्वियों के
रेप मामले की सज़ा खत्म होने के बाद शुरू होगी.
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| गल्ती हो गई, जज साहब रहम करो |
न्यायाधीश को भी भेजी गई थी. इसके बाद 30 मई 2002 को पूरा सच अखबार ने 30 मई 2002 के अंक में साध्वी से रेप मामले को 'डेरा में धर्म के नाम पर साध्वियों के जीवन किए जा रहे बर्बाद' शीर्षक से खबर छापी गई थी.
रणजीत की हत्या के बाद रामचंद्र को भी रास्ते से हटाने की कोशिश की गई थी. उन्हें काफी धमकियां दी गईं. जब इससे बात नहीं बनी तो उनके खिलाफ एससी-एसटी ऐक्ट के तहत केस दर्ज कराए गए. डेरा के ही दो अनुयायियों ने शिकायत दर्ज करवाई थी जिसमें कहा गया था कि रामचन्द्र ने उन्हें जातिसूचक अपशब्द कहे थे. हालांकि बाद में कोर्ट ने पाया था शिकायत में घटना के जिस दिन की चर्चा है उस दिन वह अपने परिवार के साथ पंजाब गए हुए थे इसलिए याचिका खारिज कर दी गई थी. इसके बाद भी रामचंद्र को जान से मारने की कई बार धमकियां दी गईं, पर वे डेरा के खिलाफ लिखने से नहीं हटे थे. अंत में फिर वही हुआ जिसका डर था. 24 अक्टूबर 2002 को सिरसा के सांध्य दैनिक 'पूरा सच' के संपादक रामचन्द्र छत्रपति पर कातिलाना हमला किया गया. छत्रपति को घर के बाहर बुलाकर उनके घर के सामने ही पांच गोलियां मारी गईं थी. रामचंद्र के घर के पास पुलिस पिकेट थी. पिकेट में मौजूद पुलिसकर्मी ने गोली मारकर भाग रहे एक आरोपी को पकड़ लिया और उसी की निशानदेही पर दूसरा आरोपी पकड़ा गया था. यही नहीं जिस रिवॉल्वर से गोली चलाई गई थी वह भी बरामद कर ली गई थी. 25 अक्टूबर 2002 को घटना के विरोध में सिरसा शहर बंद रहा और घटना के 28 दिन बाद 21 नवंबर 2002 को रामचन्द्र छत्रपति की दिल्ली के अपोलो अस्पताल में मौत हो गई थी.
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| छत्रपति का बेटा अंशुल लम्बी लड़ाई लड़ी |
हाई कोर्ट ने पत्रकार छत्रपति व रणजीत हत्या मामलों की सुनवाई इकट्ठी करते हुए 10 नवंबर 2003 को सीबीआई को एफआईआर दर्ज कर जांच के आदेश जारी किए.
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| छत्रपति का छोटा बेटा अरिंदम |
फैसले दौरान कानून व्यवस्था
विशेष अदालत दुवारा पत्रकार मामले में सुनवाई पूरी होने के बाद 11 तारीख को आरोपियों को दोषी करार दिए जाने के पहले हरियाणा सरकार ने कानून व्यवस्था को आधार बनाते हुए चारों दोषियों को विडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सजा के ऐलान की गुजारिश कोर्ट से की थी. कोर्ट में अर्जी पर बहस हुई थी और 2 जनवरी बुधवार को सरकार की अर्जी मंजूर हो गई. कोर्ट के फैसले के बाद डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी ने मीडिया से कहा कि मामले की संवेदनशीलता और प्रदेश में सुरक्षा व कानून व्यवस्था को देखते हुए सीबीआई कोर्ट ने की सरकार की याचिका मंजूर की है. उन्होंने कहा कि पिछली दफा काफी जान-माल का नुकसान हुआ था. गौरतलब है कि 25 अगस्त 2017 को साध्वी यौन शोषण मामले में
गुरमीत राम रहीम को दोषी करार दिए जाने के बाद डेरा प्रेमियों और शरारती तत्वों दुवारा पंचकूला समेत कई जगहों पर काफी आगजनी, तोड़फोड़ जैसी हिंसक घटनाओं को अंजाम दिया गया था. पूर्व में घटी घटनाओं से सबक लेते हुए इस बार हरियाणा सरकार कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी इसलिए हरियाणा में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किये गये थे. सिरसा और फतेहाबाद जिलों में धारा 144 लागू कर दी गई थी औ सिरसा में पुलिस के साथ-साथ सुरक्षा बलों की 12 कंपनियां तैनात की गई. डेरा के आसपास और अन्य संवेदनशील इलाकों में बुधवार को फोर्स द्वारा फ्लैग मार्च कर गश्त भी लगाई गई. सजा के ऐलान से ठीक पहले फतेहाबाद में भी किलेबंदी कर दी गई थी. कड़ी सुरक्षा के लिए फतेहाबाद में बीएसएफ को भी पुलिस के साथ तैनात किया गया था. डीएसपी धर्मबीर पूनिया के नेतृत्व में फतेहाबाद में 16 जगह संवेदनशील चिन्हित करके नाके लगाए गए और सिरसा में 38 जगह नाके लगाए गए हैं, जिनमें से 14 अकेले डेरा सच्चा सौदा इलाके में थे. सुरक्षा बलों की टुकड़ियों ने फ्लैग मार्च भी निकाला था और 17 से 19 तक डेरा क्षेत्र में सुरक्षा की कमान सीआरपीएफ के हाथ में दे दी गई थी. स्थिति से निपटने के लिए 38 डयूटी मजिस्ट्रेट भी तैनात किये गए थे.
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| दोषी कुलदीप और निर्मल |
मामले का घटनाक्रम
अंशुल छत्रपति ने फैसले के घटनाक्रम पर कहा, ''डेरा प्रमुख वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए सुनवाई में मौजूद था, जैसे ही फ़ैसला आया ये उसके लिए झटके जैसा था और मेरे लिए खुशी का पल. मैं फ़ैसला सुनकर भावुक हो गया. मैं कोर्ट को धन्यवाद देता हूं.''
अंशुल छत्रपति ने फैसले के घटनाक्रम पर कहा, ''डेरा प्रमुख वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए सुनवाई में मौजूद था, जैसे ही फ़ैसला आया ये उसके लिए झटके जैसा था और मेरे लिए खुशी का पल. मैं फ़ैसला सुनकर भावुक हो गया. मैं कोर्ट को धन्यवाद देता हूं.''
पत्रकार रामचंद्र छत्रपति के बेटे अंशुल
ने उस दिन की कहानी भी साझा की, जब उनके पिता की हत्या की गई थी. महीना था अक्तूबर का और साल था 2002. उन्होंने बताया, ‘’उस दिन करवाचौथ का दिन था.
मेरी मां को अचानक अपने मायके जाना पड़ा था. वहां किसी की मौत हो गई थी. मेरे पिता
रामचंद्र छत्रपति अक्सर अख़बार का काम करने के बाद घर लेट आते थे. मेरी मां के घर
से जाने के कारण उस दिन मेरी छोटी बहन और भाई ने मुझे घर जल्दी आने के लिए कहा.
इसलिए मैं घर पर था. मेरे पिता भी उस दिन करवाचौथ का दिन होने के कारण जल्दी घर आ
गए थे.’’ अपनी बात जारी रखते हुए अंशुल ने बताया,
"मेरे पिता मोटर साइकिल आंगन में खड़ा करके
अंदर आए ही थे कि किसी ने आवाज़ देकर उन्हें बाहर आने को कहा. जैसे ही वो बाहर गए,
अचनाक स्कूटर पर आए दो नौजवानों में से एक ने दूसरे को कहा,
'मार गोली'. और उसने मेरे पिता पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसा दीं हम तीनों बहन भाई
जितनी देर में यह समझ पाते कि हुआ क्या है, वो नौजवान भाग चुके थे."
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| छत्रपति की बेटी श्रेयसी |
अंशुल ने आगे बताया,
"हम तीनों ने शोर मचाया और अपने पिता को
संभालने की कोशिश की. पिताजी गली में से उठकर घर के दरवाज़े तक तो आ गए लेकिन फिर
गिर पड़े. हमारा शोर सुनकर गोली चलाकर भागे एक नौजवान को घर से थोड़ी दूर एक पुलिस
चौकी पर तैनात एक सिपाही ने पकड़ लिया. इसकी बाद में पुलिस ने शिनाख़्त भी कर ली.
तब तक लोग इकट्ठे हो गए थे. हमने पड़ोसियों की कार मांगी और पिताजी को सरकारी
अस्पताल ले गए. मेरे पिता को गोली मारे जाने की ख़बर आग की तरह फैली और
रिश्तेदारों समेत कई लोग अस्पातल में इकट्ठे हो गए. उनकी हालात बहुत ख़राब थी
इसलिए उन्हें रोहतक मेडिकल कॉलेज रेफ़र कर दिया गया. वहां उनकी हालत में कुछ सुधार
हुआ पर फिर बिगड़ने पर दिल्ली के अपोलो अस्पातल ले जाया गया था जहाँ उनकी उनकी मौत
हो गई. अंशुल ने आरोप लगाया कि उनके पिता बयान देने की स्थिति में थे पर पुलिस ने
उनके बयानों को मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज नहीं करवाया. अंशुल कहते हैं,
"हमारे ऊपर कई नेताओं ने दबाव डाला कि हम
इस मामले में पीछे हट जाए. हमारे लिए डेरा जैसी बड़ी ताक़त से लड़ना बहुत मुश्किल
था. जब ये हुआ तब मेरी उम्र महज़ 22 साल थी और मैं बीए फ़र्स्ट ईयर का छात्र था. अंशुल ने बताया कि हमें अपनी लड़ाई में मुख्यधारा की मीडिया से कभी कोई
मदद नहीं मिली. मेरे पिता सिर्फ डेरा प्रमुख का सच्चा चेहरा बाहर लाना चाहते थे.
मेरे पिता की डेरा प्रमुख से कोई दुश्मनी नही थी.
कौन है जज जगदीप सिंह
अपनी ईमानदारी और सख़्त स्वभाव के लिए
अपने साथियों में चर्चित जगदीप सिंह ने बीते साल ही स्पेशल सीबीआई जज की
ज़िम्मेदारी संभाली थी. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो गुरमीत राम
रहीम के मामले में भी जज जगदीप सिंह ने फ़ैसला सुनाते वक्त शुक्रवार को कोर्ट रूम
से सभी को जाने का आदेश दे दिया था और कोर्ट रूम में सिर्फ़ अभियुक्त और वकीलों को
रहने दिया था. जज बनने से पहले जगदीप सिंह पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में वकालत
कर रहे थे. इससे पहले सोनीपत में तैनात रहे जगदीप सिंह चार लोगों की जान बचाने के
लिए चर्चा में आ चुके हैं.साल 2016 में जज जगदीप सिंह हिसार से पंचकुला जाते समय रास्ते में एक्सीडेंट
देखकर रुक गए. इसके बाद जब एंबुलेंस लेट होने लगी तो उन्होंने ख़ुद घायलों को अपनी
गाड़ी में ले जाकर अस्पताल पहुंचाया. जगदीप सिंह हरियाणा के ही हैं और 2000
में उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी से वकालत में डिग्री हासिल की थी.
डेरे पर बीबीसी संवाददाता अरविन्द छाबड़ा
का खुलासा
बीबीसी संवाददाता अरविन्द छाबड़ा ने डेरे
के बारे में खुलासा करते हुए अपनी एक रिपोर्ट के लिखा था कि जब गुरमीत राम रहीम
सिंह पर दसवें सिख गुरू गोबिंद सिंह की नकल उतारने का आरोप लगा. पंजाब और हरियाणा
के कुछ इलाक़ों में डेरा समर्थकों और प्रदर्शनकारी सिखों के बीच झड़पें हुईं और
हालात काफ़ी तनावपूर्ण थे. मैं उस वक़्त सिरसा में स्टार न्यूज़ चैनल रिपोर्टर के
रूप में ओबी वैन पर तैनात था. चंडीगढ़ से वहां पहुंचने के बाद हमें अहसास हुआ कि
आसपास के इलाक़ों में डेरा के समर्थकों की तादाद काफ़ी थी. आसपास मौजूद ऑफ़िसों और दुकानों में 'धन धन सतगुरु तेरा ही आसरा' के बोर्ड नज़र आए. डेरा समर्थक मिलते तो एक-दूसरे से यही कहते. डेरा
की दीवारें काफ़ी ऊंची थीं. मुख्य दरवाज़ा क़िले के आगमन की तरह दिख रहा था. और
आसपास दूर-दूर तक खेत फैले थे.
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| रामरहीम की अय्याशियों का अड्डा -डेरा या फाईव स्टार होटल |
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| क्रिमनल नौटंकी बाबा या बलात्कारी |


हरियाणा ने कपिल देव, चेतन शर्मा और अजय जडेजा जैसे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर दिए हैं लेकिन हैरानी की बात है कि राज्य के पास हाल तक एक अच्छा स्टेडियम नहीं था. डेरा में दूसरे खेलों की भी व्यवस्था थी. डेरा की अपनी स्कैटिंग टीम है. हमें बताया गया कि डेरा के भीतर कारखाने भी हैं. अपने बागान और खेत हैं, वो भी इतने बड़े कि एग्रो-प्रोसेसिंग के लिए प्लांट भी बनाया गया है. यहां पैक्ड जूस और सब्ज़ियां तैयार होती थीं. हमें चखने के लिए एलोवीरा जूस दिया गया. उस वक़्त तक रीटेल बाज़ार में बाबा रामदेव के उत्पाद नहीं आए थे. मुझे पहली बार पता चला कि डेरा में ऑर्गेनिक और हर्बल उत्पाद बनाए जाते हैं. रविवार को गुरमीत राम रहीम सिंह एक महंगी गाड़ी में आए. हमें बताया गया कि ये गाड़ी ख़ुद डेरा प्रमुख ने डिजाइन की है. हज़ारों लोग वहां जाम-ए-इंसां समारोह में शिरकत कर रहे थे जिसे पीकर 'इंसान' बना जाता है. अर्थात इसे पीकर वो डेरा अनुयायी बन जाते हैं और उन्हें डेरा प्रेमी कहा जाता है और उन्हें ड्रग्स से दूर रहना होता है. मीडिया को गुरुजी से सवाल करने के लिए कहा गया. हम वहां आठ-नौ दिन रहे. डेरा प्रमुख ने प्रेस नोट जारी किया जिसमें गुरु गोबिंद सिंह से माफ़ी मांगी गई थी. कुछ दिनों के बाद हालात सामान्य हो गए और हमने वापसी का सफ़र शुरू किया.
मुख्य गवाह खट्टा सिंह की भूमिका
गुरमीत राम रहीम के पूर्व ड्राइवर खट्टा
सिंह ने गवाही में कहा था कि पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या करने के लिए डेरा
प्रमुख गुरमीत राम रहीम ने कृष्ण लाल, कुलदीप और निर्मल सिंह को आदेश दिया था. गुरमीत राम रहीम 23
अक्टूबर 2002 को जालंधर के एक सत्संग से वापिस सिरसा पहुंचा,
तो उसे कृष्ण लाल ने अखबार दिखाया, जिसमें साध्वियों के यौन शोषण के बारे में खबर छपी थी. खबर पढ़ते ही
गुरमीत तिलमिला उठा. उसने मेरे सामने कृष्ण लाल, कुलदीप और निर्मल को आदेश दिया कि रामचंद्र छत्रपति को मौत के घाट
उतार दो. 24 अक्टूबर 2002
को रामचंद्र छत्रपति
को उसके घर के बाहर गोलियों से भून दिया गया था. वैसे
बाद में खट्टा सिंह एक बार में मामले में अपने बयान से मुकर गया था. राम रहीम को
साध्वी यौन शोषण मामले में सजा होने के बाद एक बार फिर खट्टा सिंह सामने आया और उसने
सीबीआइ कोर्ट में अपने बयान दर्ज करवाए और अपना पुराना बयान दौहराया. खट्टा सिंह
ने कहा था कि वर्ष 2012 से 2018 तक वह डेरा प्रमुख के खिलाफ इसलिए सामने नहीं आया था,
क्योंकि डेरा प्रमुख खुलेआम घूम रहा था. उसके परिवार को जान का खतरा
बना हुआ था. खट्टा सिंह ने सीबीआइ अदालत में बताया था कि यदि वह डेरा प्रमुख के
खिलाफ पहले बयान दे देता, तो उसे और उसके बेटे को डेरा प्रमुख जान से मरवा सकता था. इसकी मुझे
धमकियां भी मिली थीं. गौरतलब है कि वर्ष 2011 में सीबीआइ कोर्ट के समक्ष बयान दिया था कि उसे राम रहीम के खिलाफ बयान
देने का दबाव डाला जा रहा है. खट्टा सिंह कह चुका था कि उसे इन मामलों में डेरा
प्रमुख की भूमिका के बारे में कोई जानकारी नहीं है. लेकिन 25
अगस्त 2017 को गुरमीत सिंह के साध्वी यौन शोषण मामले में सजा होने के बाद खट्टा
सिंह ने दोबारा गवाही देने के लिए मौका मांगा था. इस मामले के प्रमुख गवाह गवाह
खट्टा सिंह ने रामरहीम को सजा मिलने पर खुश होते हुए कहा कि क्रिमनल दोंगी बाबा को
उसके गुनाहों की सज़ा मिली है. उसने साध्वियों का बलात्कार किया था. खट्टा सिंह इस
इंसाफ की लड़ाई में शरुआत से लेकर अंत तक पीड़ित परिवार के साथ कंधे से कन्धा मिला
कर हर मोर्चे पर साथ रहे थे. कई साल पहले भी उन्होंने रामरहीम की करतूतों का पर्दा
फाश किया था. न्याय प्रणाली पर अपना विश्वास जताते हुए दोषियों को सज़ा मिलने पर
उन्होंने ख़ुशी ज़ाहिर की थी. वैसे इस मामले में रामरहीम को सज़ा होने की लाखों लोगों
ने दुवाएं और प्राथनाएं की थी.
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| मुख्य गवाह खट्टा सिंह |
--हरमिन्दर कपूर
















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