गुरुवार, 3 अक्टूबर 2019

-कहानी फ़िल्मी लगती है-

  -कहानी फ़िल्मी लगती है-
जगजीत सिंह और रविंदर कौर की शादी का फोटो 

यह किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है. घर की करोड़ों की दौलत ठुकराकर एक व्यक्ति घर से भागकर पत्नी को फंसाने के लिए ढाबे पर बर्तन धोने का काम करने लगा. वह भी पिछले 11 वर्ष से. इस बात की किसी को कानोंकान खबर तक नहीं लगी कि जो व्यक्ति बर्तन धो रहा है वह एक बड़़े धनाड्ढ परिवार का है. मामला तब खुला जब पति की हत्या का आरोप झेल रही पत्नी ने थाना लांबड़ा के एसएचओ सब इंस्पेक्टर पुष्प बाली की सहयता से उसे ढूंढ निकाला. पुलिस के सामने उसने कुबूल किया कि वह महिला का पति है और उसने यह सब पत्नी को फंसाने के लिए किया था.
हानी फ़िल्मी जरूर लगती है पर है हकीकत. क्या ऐसा भी हो सकता है कि एक करोड़पति इंसान सिर्फ इसलिए अपने घर से लापता हो जाये कि वह अपनी पत्नी और उसके परिवार को सबक सिखा सके.? यह अजीबोगरीब मामला भी कुछ ऐसा ही है.
पंजाब में काले दौर के समय बहुत बड़ी तादात में लोग अपनी जान-माल की सुरक्षा के लिए पंजाब से पलायन कर देश के अन्य शहरों में जाकर बस गये थे जिन में अधिकांश व्यापारी तबके के लोग शामिल थे. सरदार मंजीत सिंह बग्गा, जिनका कपड़े का बहुत बड़ा कारोबार था. वे भी अपना कारोबार समेटकर पंजाब छोड़ अपनी बीवी बच्चों सहित उत्तर प्रदेश के जिला राय बरेली में आकर बस गये थे. राय बरेली के गुरु नानक नगर में कोठी नम्बर-13 लेकर उन्होंने रिहायश बनाकर अपना कपड़े का काम वहीँ शुरू कर दिया था. उनके पास अधिकांश ग्राहक यूपी, बिहार और महाराष्ट्र के थे. सो ग्राहकों को उनके पंजाब से रायबरेली आने से कोई फर्क नहीं पड़ा था. बल्कि उन्हें सहूलियत मिल गई थी. देखते-देखते ही मंजीत सिंह बग्गा का धंधा पंजाब से भी अधिक चल निकला था.
रविंदर कौर का ताज़ा फोटो 
मंजीत सिंह के परिवार में पत्नी के अलावा उनके दो पुत्र थे. बड़ा बेटा जगजीत सिंह बग्गा उर्फ़ सोनू तथा सुरजीत बग्गा. बड़े होने के बाद दोनों बेटे अपनी-अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने पिता के कपड़े के कारोबार में शामिल हो गये थे. उन्होंने गारमेंट कपड़ो के लिए फैक्ट्री भी लगा ली थी जिसकी देखभाल जगजीत सिंह किया करता था. कारोबार और परिवार जब पूरी तरह से सेट हो गये तो मंजीत सिंह ने 14 अक्टूबर 2001 को अपने बड़े बेटे जगजीत सिंह की शादी साहिब गंज फैजाबाद निवासी जसवंत सिंह की पुत्री रविंदर कौर के साथ कर दी थी. शादी के बाद कुछ समय तक दोनों पति-पत्नी बड़े खुश थे. जगजीत आम लोगों की तरह घर में बैठकर दो-चार पेग शराब जरूर पीता था, पर शराब को लेकर उनका आपस में कभी झगड़ा नहीं हुआ था. उन के घर दो बेटों ने जन्म लिया. जिनके नाम हरप्रीत सिंह और हरमीत सिंह रखे गये थे. बेटों के जन्म के बाद अपने काम की व्यस्तता के कारण या किन्हीं अन्य वजह से दोनों पति-पत्नी एक दूसरे को समय नहीं दे पा रहे थे, जिस कारण दोनों के बीच झगड़ा रहने लगा था. शुरू में तो तो यह बात मामूली कहासुनी से शुरू हुई थी, जैसा की हर घर में होता है. पर कुछ ही महीनों में जगजीत सिंह और रविंदर कौर के बीच के डिफरेंशन इतने ज्यादा बढ़ गये कि दोनों ने एक-दूसरे से बात तक करना बंद कर दिया था. 
जगजीत सिंह का ताज़ा फोटो 

गजीत सिंह के पिता मंजीत सिंह ने और रविंदर कौर के पिता जसवंत सिंह ने भी दोनों को काफी समझाया पर उनके बीच का क्लेश कम होने की बजाय बढ़ता ही गया था. रोज-रोज के क्लेश से दुखी होकर अंत में मंजीत सिंह ने अपने बेटे जगजीत सिंह और बहु रविंदर कौर को घर से अलग कर दिया था. अब जगजीत  किराये पर मकान लेकर अपनी बीवी बच्चों के साथ रहने लगा था और पिता की फैक्ट्री में काम करता था. जगजीत के घर का सारा खर्च उसका पिता मंजीत सिंह देता था. पति-पत्नी के बीच बातचीत अब भी बंद थी. बाद में दोनों के बीच झगड़ा इतना बढ़ गया कि रविंदर कौर अपने दोनों बच्चे लेकर अपने मायके फैजाबाद रहने चली गई. यह 2009 की बात है. बाद में जगजीत भी अपनी पत्नी के पास आकर किराये के मकान में रहने लगा था.
रविंदर कौर के अलग हो जाने पर मंजीत सिंह ने बच्चों की परवरिश के लिए खर्चा देना बंद कर दिया तब रविंदर कौर ने न्यायालय की शरण ली और साल 2009 में अपने पति जगजीत सिंह बग्गा और उसके परिवार पर जिला अयोध्या फैजाबाद की फैमली कोर्ट में धारा 125 पर खर्चे का मुकदमा दायर कर दिया. जिसे माननीय सत प्रकाश की अदालत ने मकदमा नम्बर 104/9 पर रविंदर की याचिका मंजूर कर उस पर सुनवाई शुरू कर दी थी. रविंदर कौर ने अपनी याचिका में लिखा था कि मेरे परिवार को मेरे ससुर मनजीत सिंह ने खर्चा देना बंद कर दिया है. मेरे छोटे-छोटे दो बच्चे हैं और मै किराये के घर में रहती हूँ. और बच्चों को पालने में असमर्थ हूँ.
यह मुकदमा अभी चल ही रहा था कि अचानक एक दिन रविंदर कौर की जिन्दगी में एक ऐसा तूफान आया जिसने उसके साथ उसके माता-पिता के परिवार को भी बिखेर कर रख दिया था.

थाना लाम्बरा प्रभारी पुष्प बाली , रविंदर कौर, जगजीत सिंह और वकील विजय शंकर 
सुबह अपनी फैक्ट्री गया जगजीत शाम को जब वापिस घर नहीं लौटा था. ऐसे में सब का चिंतित होना स्वभाविक था. देर रात तक इंतज़ार करने के बाद रविंदर कौर ने यह बात फोन द्वारा अपने ससुर मंजीत सिंह को बताई. रविंदर और उसके बच्चों को तो उसकी चिंता थी ही पर सबसे अधिक चिंतित उसके माता-पिता थे. मंजीत सिंह अपने बेटे जगजीत से बहुत प्यार करते थे. बहरहाल जगजीत के यारों दोस्तों के अलावा उन सभी ठिकानो पर उसकी तलाश की गई जहां उसके होने की सम्भावना हो सकती थी. रिश्तेदारों में भी पता किया गया. जब कहीं से जगजीत के ना होने की खबर मिली तो मंजीत सिंह बग्गा ने अपने बेटे जगजीत के लापता होने की रिपोर्ट थाना कोतवाली रायबरेली में दर्ज करवा दी थी. मामला एक ऐसे धनाड्य परिवार के व्यापारी से जुड़ा हुआ था जिनकी शहर में काफी साख थी और ऊपर तक पहंच थी. सो पुलिस ने सबसे पहले जगजीत का फोटो लेकर प्रदेश के सभी थानों में सर्कुलेट करवा दिया. उसके बाद उसके मोबाईल फोन को चेक किया गया तो पता चला कि जगजीत का फोन घर पर ही बज रहा था. पूछने पर रविंदर कौर ने बताया कि जगजीत उसदिन अपना फोन घर पर ही छोड़ गये थे. इस पर पुलिस ने अनुमान लगाया कि एक सफल व्यापारी अपना फोन गलती से भी घर नहीं भूल सकता. पुलिस ने इस बात के दो अर्थ लगाये कि या तो जगजीत अपनी मर्जी से कहीं गायब हो गया है या फिर घर की चार दीवारी के भीतर कुछ और ही खिचड़ी पकी थी, जिसकी सुगंध अभी तक बाहर नहीं आई थी. क्योंकि पति-पत्नी के बीच झगड़ा था इस बात का पता पुलिस को तफ्तीश के दौरान लग गया था. बहरहाल पुलिस ने जगजीत का फोन नम्बर सर्विलांस पर लगवा दिया था. उच्च अधिकारीयों के दबाव के कारण थाना कोतवाली पुलिस ने जगजीत की तलाश में दिन-रात एक कर दिया था. मुखबिरों की भी सहायता ली गई और रविंदर कौर से भी कई बार बारीकी से पूछताछ की गई थी पर जगजीत का कहीं कोई सुराग नहीं लगा था. जगजीत की तलाश करने में अब तक पुलिस ने कई जाँच एजेंसियों का सहारा लिया था पर नतीजा शून्य निकला. अब तो पुलिस को भी संदेह होने लगा था कि जगजीत के साथ घर के भीतर ही कोई हादसा हुआ था. शायद उसकी हत्या कर दी गई थी. रविंदर कौर पर पुलिस के साथ-साथ उसके ससुर मंजीत सिंह बग्गा का दबाव बढ़ने लगा था. जबकि रविंदर कौर की समझ में नहीं आ रहा था कि वह इन हालतों का सामना कैसे करे. उसका अपना दिल यह बात मानने को तैयार ही नहीं था कि जगजीत के साथ कोई हादसा हो सकता है. आखिर अपने ससुर और पुलिस की परवाह ना करते हुए रविंदर कौर ने थाना कोतवाली पुलिस से लेकर डीएसपी, एसपी, आईजी, डीजीपी, जिलाधीश और राज्य के मुख्यमंत्री तक को दरखास्ते लिख-लिख इस बात की गुहार लगाई कि उसने या उसके परिवार ने  जगजीत का ना अपहरण किया है ना ही उसकी हत्या हुई है. अगर वह लापता है तो अपनी मर्जी से कहीं गायब हो गया है या फिर मेरे पति जगजीत सिंह को गायब करने में मेरे ससुर मंजीत सिंह का हाथ हो सकता है.
जगजीत सिंह का पुराना फोटो 
गजीत को लापता हुए जब दो साल हो गए और उसका ना तो कोई सुराग लगा ना उसका या उसके बारे में जब कहीं से कोई फोन नहीं आया तो मंजीत सिंह बग्गा ने अपनी बहु रविंदर कौर पर सीधे आरोप लगाते हुए कहा कि तुमने ही अपने पिता जसवंत सिंह, भाई तनप्रीत सिंह और रविंदर कौर के फूफा प्रोफेसर हर्षत सिंह के साथ मिलकर जगजीत का अपहरण करवा कर उसकी हत्या करवाकर उसकी लाश कहीं खुर्दबुर्द कर दी है. मंजीत सिंह बग्गा ने रायबरेली की अदालत में जगजीत सिंह बग्गा के अपहरण और मर्डर का कंप्लेंट केस रविंदर कौर उसके पिता जसवंत सिंह, भाई तनप्रीत सिंह और शादी करवाने वाले बिचौलिए प्रोफेसर हर्षत सिंह पर दायर कर दिया था. यह केस 6 जून 2012 को दायर किया गया था. इस मामले में चारों आरोपियों को अदालत में पेश होना पड़ा और जमानते करवानी पड़ी थी. रायबरेली की अदालत में जब इस केस ट्रायल शुरू हुआ तो रविंदर कौर ने अपने साथ अन्य आरोपियों को निर्दोष बताते हुए अदालत को बताया कि उसका पति जगजीत सिंह जिन्दा है और लापता है जिसे पुलिस ढूंढ़ने में नाकाम रही है. इस मामले की सीबीआई जाँच करवाई जाये ताकि सच सबके सामने आ सके. अदालत ने रविंदर कौर की यह दरखास्त खरिज कर दी और मुक़दमे की सुनवाई जारी रखी.
रविंदर कौर बार-बार अपने पति जगजीत सिंह के जिन्दा होने का दावा ऐसे ही नहीं कर रही थी. दरअसल दो वर्ष पहले से उसे अलग-अलग नम्बरों से गुमनाम फोन आते थे. फोनकर्ता अपना नाम बताये बिना केवल परिवार के सदस्यों का हालचाल जानना चाहता था. फोनकर्ता ने कभी अपना नाम नहीं बताया था, पर रविंदर कौर उस आवाज़ को अच्छी तरह से पहचानती थी. वह आवाज़ जगजीत सिंह की थी. रविंदर ने यह बात कोतवाली पुलिस और आला अफसरों को भी बताई थी और वह फोन नम्बर भी दिया था जिन नम्बरों से उसे फोन आते थे. पुलिस ने उन नम्बरों को ट्रेक कर जब पता लगाया तो मालूम पड़ा कि वह नम्बर किन्ही ट्रक ड्राइवरों के थे, जो अलग-अलग राज्यों बिहार, बंगाल, महाराष्ट्र आदि के रहने वाले थे. पूछताछ में उन्होंने बताया कि जगजीत सिंह नामक किसी व्यक्ति से उनका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था.
एस एच ओ थाना लाम्बरा पुष्प बाली 

क तरफ जगजीत की तलाश भी हो रही थी और दूसरी तरफ उसी की हत्या का मुकदमा उसकी पत्नी रविंदर कौर, उसके पिता जसवंत सिंह, भाई तनप्रीत सिंह और शादी करवाने वाले बिचौलिए प्रोफेसर हर्षत सिंह पर चल रहा था. पिछले 10 सालों से रविंदर कौर अपने पति की हत्या के मुकदमे का सामना कर रही थी. इस केस में अभियोजन पक्ष की ओर से कई सच्चे-झूठे गवाह भी पेश किये गये थे. तमाम गवाहियाँ और बहस पिछले माह पूरी हो चुकी थी और फैसले की तारीख़ माननीय अदालत ने 10 अक्टूबर 2019 तय की थी और इस मामले में रविंदर कौर को सज़ा होना तय थी.
दिनांक 23- 9- 2019 को पंजाब के जालंधर देहात एसएसपी नवजोत सिंह माहल को फैज़ाबाद की फैमली कोर्ट से एक फैक्स प्राप्त हुआ, जिसमें यह लिखा था कि रविंदर कौर बनाम जगजीत सिंह उर्फ़ सोनू पुत्र मंजीत सिंह बग्गा निवासी- 13 गुरु नानक नगर, बरेली यूपी. केस नम्बर 104/9 धारा-125 में रुपये 4 लाख 32 हज़ार का कंडिशनल वारंट जारी किया गया है. आरोपी जालंधर देहात क्षेत्र में कहीं छुपा बैठा है. तत्काल प्रभाव से उसे अरेस्ट कर फैजाबाद की अदालत में पेश किया जाये. दरअसल फैजाबाद की अदालत में जज के सामने केस की बहस के दौरान रविंदर कौर के एडवोकेट विजय शंकर पाण्डेय ने कहा था कि जगजीत सिंह जिंदा है और वह जालंधर में किसी स्थान पर छुपा बैठा है. इसके बाद यूपी फैजाबाद की अदालत ने जालंधर देहात के एसएसपी नवजोत सिंह माहल को रविंदर कौर के पति जगजीत बग्गा को ढूंढने का आदेश फैक्स द्वारा दिया था.
उक्त फैक्स मिलने के बाद एसएसपी नवजोत सिंह माहल ने जालंधर देहाती क्षेत्र के थाना लांबड़ा के एसएचओ सब इंस्पेक्टर पुष्प बाली को उक्त फैक्स देते हुए आरोपी को शीघ्र तलाश कर अरेस्ट करने के आदेश दिए. एसआई पुष्प बाली को यह आदेश दिनांक 24-9-2019 को प्राप्त हुए और उसी दिन से उन्होंने अर्रोपी की तलाश शुरू कर दी. दिनांक 25 सितम्बर को रविंदर कौर थाना लांबड़ा पहुंची और एसआई पुष्प बाली से मिलकर उसने अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए प्रार्थना की कि यदि उसके पति जगजीत को शीघ्र ना ढूंढ़ा गया तो आने वाली 10 अक्टूबर को निर्दोष होते हुए भी अपने पति की हत्या के अपराध में उसे और उसके परिवार को जेल जाना पड़ेगा. रविंदर कौर ने पुष्प बाली को अपने पति जगजीत के लापता होने का शुरू से अंत तक का सारा मामला समझाया. और वह फोन नम्बर भी दिया जिससे कुछ दिन पहले उसे जालन्धर से अपने पति का फोन आया था. एसआई पुष्प बाली ने उक्त फोन नम्बर की डिटेल और लोकेशन निकलवाकर चेक की. वह फोन किसी ऑटो वाले का था. आटोवाले को बुलाकर जब पूछताछ की गई तो उसने बताया.
‘’ साहब गांव सिंघा में हरनेक ढाबे पर काम करने वाले आदमी ने उससे फोन मांगा था और कॉल की थी.’’
फैजाबाद अदालत के आदेश और जगजीत का नया और पुराना फोटो 


पुष्प बाली ने समय व्यर्थ ना करते हुए हरनेक ढाबे पर जाकर जगजीत को अरेस्ट कर रविंदर कौर के सामने ला खड़ा कर दिया. अपने सामने अपने पति को देख रविंदर कौर एकाएक पहचान ही नहीं पायी थी. क्योंकि जगजीत 11 साल पहले जब घर से लापता हुआ था तब उसके सिर पर बाल और पगड़ी थी और वह बड़ा तंदरुस्त व्यक्ति था. लेकिन सामने खड़ा हुआ जीर्ण श्रीढ़ मोना व्यक्ति किसी भी रूप में उसका पति नहीं लग रहा था. काफी देर तक दोनों मौन धारे खड़े एक दूसरे को देखते रहे थे. यह द्रश्य किसी की भी आत्मा को झकझोड़ देने वाला था. अंत में जगजीत ने रविंदर कौर को पुकारा.
‘’ सोनी.’’
सामने खड़े व्यक्ति के मुख से यह शब्द सुनते ही रविंदर कौर के सब्र का बांध टूट गया और वह फूट-फूट कर रोते हुए जगजीत से लिपट गई.
जब रविंदर और जगजीत की शादी हुई थी तब वह हनीमून मनाने शिमला गये थे और प्यार से जगजीत ने रविंदर कौर का नाम सोनी रखा था और अपनी बाजु पर सोनू और सोनी गुदवाया था. पुरानी यादें एकबार फिर से ताज़ा हो गई थी. पति मिल जाने के बाद रविंदर कौर ने थाने से ही फोन कर जगजीत की बात अपने बेटों हरप्रीत बग्गा और हरमीत बग्गा से करवाई. बेटों की आवाज़ सुनकर जगजीत काफी भावुक हो गया था. जिस समय उसने घर छोड़ा था तब हरप्रीत 5 साल का था जो अब 17 साल का गबरू जवान हो गया था. इस मामले को हल करने में थाना प्रभारी पुष्प बाली को इतनी ख़ुशी और आत्म संतोष मिला जितना आज तक उन्हें अपनी पूरी नौकरी के दौरान नहीं मिला था. दो बिछड़े हुओं को मिलाना और 4 निर्दोषों को सज़ा से बचाना. वैसे तो इस मामले में एसआई पुष्प बाली का कोई वास्ता नहीं था. उनका काम सिर्फ इतना था कि वे अदालत के आदेश को मानकर जगजीत को तलाश कर उसे फैजाबाद की अदालत तक पहुंचाए. पर मामला इतना दिलचस्प था कि उन्होंने इस पूरे प्रकरण की जगजीत और रविंदर कौर से पूछताछ की. पूछताछ में जो कहानी सामने आई वह कम चौंका देने वाली नहीं थी.
गुरुनानक नगर, थाना कोतवाली, बरेली, यूपी में करोड़ों का मालिक जगजीत सिंह बग्गा उर्फ़ सोनू सिर्फ अपनी पत्नी को फंसाने के लिए ढाबे पर बर्तन साफ रहा था. सोनू के पिता का वहां पर कपड़े का बड़ा कारोबार है. खुद की फैक्ट्री भी लगाई हुई है और वहां पर वह ऐश की जिन्दगी जीता था. शादी के कुछ सालों बाद पत्नी के साथ विवाद शुरू हुआ तो उससे तलाक मांगा. पत्नी ने तलाक देने से मना कर दिया तो वो वहां से भागकर जालंधर आ गया और थाना लांबड़ा अंतर्गत के मुद्दा गांव में एक ढाबे पर बर्तन मांजने की नौकरी करने लगा. तीन साल तक मुद्दा गांव में ढाबे पर काम करने के बाद वो वह नौकरी छोड़ गांव सिंघा में हरनेक ढाबे पर बर्तन मांजने का काम करने लगा. ढाबे पर उसे चार हजार रुपये पगार के साथ-साथ खाना और कपड़े मिल रहे थे, जिससे वो गुजारा कर रहा था.
जांच में सामने आया कि सोनू के परिजनों को पता था कि वो जालंधर, लांबड़ा के सिंघा गांव में है. उसने अपने परिवार से अपनी बदहाली की बात कभी नहीं बताई थी कि कहीं घर वाले आर्थिक मदद न भेज दें और वह फंस जाए. यहां तक कि  वह अपने पिता या परिवार से जब भी बात करता तो रिश्तेदारों के फोन के जरिए ही करता था. उसे डर था कि कहीं परिवार के फोन को पुलिस ट्रैप पर न लगा दे और वह पकड़ा जाये.
जगजीत कुछ महीने पहले से अपनी पत्नी रविंदर कौर को अलग-अलग नम्बरों से फोन कर कहा था. ढाबे पर आने वाले ट्रक ड्राइवरों से वह फोन मांग लिया करता था. इसी लिए पुलिस उसका फोन ट्रेक नहीं कर पाई थी. आखरी काल उसने एक ऑटो वाले के फोन से की थी, जिससे वह पकड़ में आ गया था. आखरी काल में जगजीत ने रविंदर कौर से कहा था.     
‘वह क्यों मेरे घरवालों को बिना वजह तंग कर रही है. वह जिंदा है और कहां है यह वो नहीं बताएगा, दम है तो ढूंढकर दिखाए. मुझे तुम तो क्या, तुम्हारा बाप भी नहीं पकड़ा सकता.’
यह फोन उसने तब किया था जब उसे इस बात का पता चला था कि रविंदर कौर ने उसके और उसके परिवार पर जो खर्चे का केस डाल रखा था वह जीत गई है और अब उसके पिता को अदालत में साढ़े चार लाख रुपये जमा करने पड़ेंगे.
जगजीत के मिल जाने के बाद जालंधर के एसएसपी माहल ने इसकी जानकारी यूपी फैजाबाद की अदालत को दी. फैजाबाद अदालत की तरफ से ई-मेल स्थानीय एसएसपी माहल को आया कि वह पुलिस कस्टडी में पूरी सुरक्षा के साथ जगजीत सिंह व रविंदर कौर को फैजाबाद अदालत में पेश करें, इसका पूरा खर्च अदालत वहन करेगी. थाने ने कागजी करवाई पूरी करने के बाद दिनांक 28-9-2019 को अदालत के आदेश पर थाना लांबड़ा पुलिस जगजीत सिंह को यूपी ले गई ताकि उसे फैमिली कोर्ट फैजाबाद में और रायबरेली की ट्रायल कोर्ट में पेश किया जा सके.
हर अपराधी को यह गलतफहमी होती है कि उसने जो अपराध किया है, उसे कोई पकड़ नहीं सकता. जैसे-जैसे समय गुज़रता है वैसे ही अपराधी का आत्मविश्वास भी बढ़ने लगता है. यही गलतफहमी जगजीत उर्फ़ सोनू को भी हो गई थी और वह गलती कर बैठा. लेकिन उसकी इस गलती ने चार निर्दोष लोगों को जेल जाने से बचा लिया था.
( पुलिस सूत्रों पर आधारित कथा का नाट्य रुपान्तरण)
-हरमिन्दर कपूर

गुरुवार, 4 अप्रैल 2019

बेमौत मारा गया बेचारा काला टोपी वाला


बेमौत मारा गया बेचारा काला टोपी वाला
                                                        सरिता फोटो 

लाश अभी तक पूरी तरह सड़ी नहीं थी, पर सड़ने जरूर लगी थी. मृतक काला के पेट में एक गहरा सुराख था, जिस में से खून निकल कर जम कर काला पड़ चुका था. घटनास्थल की सारी काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया गया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, काला के पेट में कोई तेजधार वाली नुकीली चीज घुसेड़ कर घुमाई गई थी, जिस से नाभि चक्र एवं आंतें कट गई थीं. इसी वजह से उस की मौत हो गई थी. अजायब सिंह की तहरीर पर काला की हत्या का मुकदमा दर्ज कर पुलिस कुलदीप कौर की तलाश में जुट गई. उस के मायके में छापा मारा गया, पर वह वहां नहीं मिली.

हत्यारी पत्नी कुलदीप कौर 
4 मार्च, 2017 की सुबह काम पर जाने के लिए जैसे ही मक्खन सिंह घर से निकला, सामने से जंगा आता दिखाई दिया. वह उसी की ओर चला आ रहा था, इस का मतलब था कि वह उसी से मिलने आ रहा था. उस ने जंगा से हाथ मिलाते हुए पूछा, ‘‘सुबहसुबह ही इधर, कोई खास काम…?’’
‘‘मैं तुम्हारे पास इसलिए आया था कि तुम्हें काले के बारे में कुछ पता है?’’
‘‘नहीं, उस के बारे में तो कुछ पता नहीं है. उस से तो मुझे जरूरी काम था, पर वह मिल ही नहीं रहा है.’’ मक्खन सिंह ने पछतावा सा करते हुए कहा.
‘‘मैं ने तो उसे कई बार फोन भी किया, पर बात ही नहीं हो सकी.’’
‘‘मैं तो उसे लगातार 3 दिनों से फोन कर रहा हूं. हर बार एक ही जवाब मिल रहा है कि उस का फोन बंद है. यार एक बहुत बड़ा ठेका मिल रहा है, पार्टी पैसे ले कर मेरे पीछे घूम रही है, पर काले के बिना बातचीत रुकी पड़ी है.’’ मक्खन सिंह ने कहा.
‘‘एक काम मेरे पास भी है. रेट भी ठीकठाक है, पर काले के बिना बात नहीं बन रही. पता नहीं वह कहां गायब हो गया है?’’
जंगा और मक्खन काफी देर तक काले के बारे में ही बातें करते रहे. अंत में कुछ सोचते हुए जंगा ने कहा, ‘‘मक्खन, क्यों न हम एक काम करें. हमारी एक दिन की मजदूरी का नुकसान तो होगा, पर काले के बारे में पता तो चल जाएगा.’’
‘‘लेकिन मुझे तो उस का घर भी नहीं मालूम.’’
‘‘घर तो मैं भी नहीं जानता, पर इतना जरूर जानता हूं कि वह बस्ती अजीतनगर में कहीं किराए पर रहता है. वहां चल कर लोगों से पूछेंगे तो कोई न कोई उस के बारे में बता ही देगा.’’
इस तरह जंगा और मक्खन काम पर जाने के बजाए काला की तलाश में अजीतनगर जा पहुंचे.
काला टोपी वाला के नाम से मशहूर नवनीत सिंह जंगा, मक्खन, रमेश और नरेश आदि के साथ मिल कर मकान बनाने का ठेका लेता था. सभी राजमिस्त्री थे, इसलिए सब मिलजुल कर काम करते थे और जो फायदा होता था, आपस में बांट लेते थे.
कौन था काला टोपी वाला 
वनीत सिंह काला टोपी वाला के नाम से इसलिए मशहूर हो गया था, क्योंकि उस का घर का नाम काले था. वह हर समय सिर पर काली टोपी लगाए रहता था, इसलिए लोग उसे काली टोपी वाले कहने लगे थे. काले बेहद शरीफ, नेकदिल और मेहनती युवक था.
वह जिला मानसा के गांव बीरखुर्द कलां के रहने वाले अजायब सिंह का बेटा था, लेकिन काम की वजह से वह लगभग 5 साल पहले जिला संगरूर में आ कर रहने लगा था. यहां उस का काम ठीकठाक चल निकला तो वह उपनगर बस्ती अजीतनगर में राकेश के मकान का एक हिस्सा किराए पर ले कर उसी में परिवार के साथ रहने लगा था. उस के परिवार में पत्नी कुलदीप कौर के अलावा 2 बच्चे थे.
हत्यारी पत्नी कुलदीप कौर के साथ काला  
नवनीत सिंह उर्फ काला टोपी वाला की शादी सन 2007 में कुलदीप कौर के साथ तब हुई थी, जब काला अपने मांबाप के साथ गांव में रहता था. एक दिन वह नजदीक के गांव में किसी के मकान की छत डाल रहा था, तभी उस की मुलाकात कुलदीप कौर से हुई थी. वह पड़ोस में रहती थी. काम करने के दौरान काला और कुलदीप कौर की आपस में आंखें लड़ गईं. मकान का काम पूरा होतेहोते दोनों में ऐसा प्यार हुआ कि दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया.
दोनों की जाति अलगअलग थी, इसलिए घर वाले शादी के लिए तैयार नहीं थे. ऐसे में एक ही सूरत थी कि वे घर से भाग कर शादी कर लें. आखिर उन्होंने यही किया. दोनों ने भाग कर शादी कर ली और अदालत में शादी रजिस्टर्ड करवा कर पतिपत्नी की तरह शान से रहने लगे. समय के साथ दोनों के परिवार भी शांत हो कर बैठ गए और उन का अपनेअपने घर आनाजाना शुरू हो गया.
काला का घर ढूंढते हुए जंगा और मक्खन दोपहर को राकेश घर पहुंचे तो जिस हिस्से में काला रहता था, उस के दरवाजे पर दस्तक दी. तब अंदर से पूछा गया, ‘‘कौन?’’
जंगा ने पूरी बात बता कर काला से मिलने की इच्छा जताते हुए कहा कि उस से उस का मिलना बेहद जरूरी है, क्योंकि उस की वजह से काम के साथसाथ पैसे का भी नुकसान हो रहा है.
पूरी बात सुनने के बाद कुलदीप कौर ने बिना दरवाजा खोले ही अंदर से कहा, ‘‘वह तो कहीं बाहर गए हैं. घर पर नहीं हैं. कब लौटेंगे, यह भी बता कर नहीं गए हैं. जब आएंगे, तब आ कर मिल लेना. अभी आप लोग जाइए.’’
इंस्पेक्टर जसविंदर सिंह टिवाणा
कुलदीप कौर का टका सा जवाब सुन कर दोनों एकदूसरे का मुंह देखने लगे. कहां तो वे यह सोच कर आए थे कि काला मिले न मिले, उस के घर चायनाश्ता तो मिलेगा ही, लेकिन यहां तो चायपानी की कौन कहे, 2 बार कहने पर दरवाजा भी नहीं खुला.
कुलदीप कौर के इस व्यवहार से दोनों असमंजस में थे. मामला क्या है, उन की समझ में नहीं आ रहा था. बेआबरू हो कर वे दरवाजे से लौटने के लिए पलटे ही थे कि काला के पिता अजायब सिंह वहां आ गए. उन्होंने भी काला से मिलने के लिए दरवाजा खटखटाया, पर कुलदीप कौर ने यह कह कर दरवाजा नहीं खोला कि अभी वह कोई जरूरी काम कर रही है, इसलिए वह कल आएं.
जंगा और मक्खन अभी वहीं खडे़ थे. दोनों ससुर और बहू के बीच होने वाली बातें भी सुन रहे थे. अजायब सिंह बड़ी बेबसी से कह रहे थे, ‘‘3 दिनों से कोशिश कर रहा हूं अपने बेटे से मिलने की, पर यह औरत मिलने नहीं दे रही है. रोज कोई न कोई बहाना बना कर लौटा देती है. कल मैं अपने कुछ रिश्तेदारों के साथ काले से मिलने आया था, तब इस ने बड़ी चालाकी से हमें लौटा दिया था.
‘‘यह हम सभी को बाजार ले गई और वहां बोली, ‘तुम सभी घर जाओ, मैं शाम को उन्हें भेज दूंगी.हम सब इंतजार करते रहे, काला नहीं आया. तब मुझे फिर आना पड़ा. अभी भी देखो न, कुछ बता नहीं रही है.’’
बहु पर संदेह और पुलिस रिपोर्ट 
''पापाजी बुरा मत मानना, हमें तो माजरा ही कुछ समझ में नहीं आ रहा है. भला कोई अपने ससुर से इस तरह का व्यवहार करता है?’’ जंगा ने कहा तो बुजुर्ग अजायब सिंह का सिर शरम से झुक गया. उस बीच मकान मालिक राकेश भी वहां आ पहुंचा. पूरी बात सुन कर उस ने कहा, ‘‘मुझे तो कुछ और ही संदेह हो रहा है. कल से मकान के काले वाले हिस्से से अजीब सी दुर्गंध आ रही है. 2 दिनों से कुलदीप भी दरवाजा नहीं खोल रही है. पापाजी मेरी बात मानो तो पुलिस को खबर कर दो. खुद ही पता चल जाएगा कि माजरा क्या है?’’
यह बात सभी को उचित लगी. सभी थाना सिटी पहुंचे और थानाप्रभारी इंसपेक्टर जसविंदर सिंह टिवाणा से मिल कर उन्हें पूरी बात विस्तार से बताई. इस के बाद उन्होंने अजायब सिंह से तहरीर ले कर मामला दर्ज कराया और इस मामले की जांच चौकीप्रभारी बलजिंदर सिंह चड्ढा को सौंप दी.
चौकीप्रभारी बलजिंदर सिंह अजीतनगर स्थित काला के मकान पर पहुंचे और कुलदीप कौर से काला के बारे में पूछा. कुलदीप कौर पुलिस को भी गुमराह करते हुए कहती रही कि वह बाहर गए हैं. मकान से दुर्गंध आ रही थी, इसलिए बलजिंदर सिंह को मामला संदेहास्पद लगा. उन्होंने फोन द्वारा पूरी बात थानाप्रभारी को बताई तो वह एएसआई बलकार सिंह, तरसेम कुमार और अशोक कुमार को साथ ले कर अजीतनगर स्थित राकेश के मकान पर आ पहुंचे.
उन्होंने भी कुलदीप कौर से काला के बारे में पूछा तो अन्य लोगों की तरह उस ने उन्हें भी टालने की कोशिश करते हुए बताया कि वह शहर से बाहर गए हैं. कहां गए हैं, यह बता कर नहीं गए हैं. हार कर थानाप्रभारी ने साथ आई महिला हैडकांस्टेबल सुरजीत कौर को इशारा किया तो उस ने कुलदीप कौर से थोड़ी सख्ती की तो उस ने कहा, ‘‘काला की हत्या हो गई है. उस की लाश रसोईघर में पड़ी है.’’
प्रैसवार्ता के दौरान पुलिस अधिकारी  
काला की लाश रसोईघर में पड़ी होने की बात सुन कर सब हैरान रह गए. थानाप्रभारी जसविंदर सिंह साथियों के साथ मकान के अंदर पहुंचे तो रसोईघर में काला की लाश पड़ी मिल गई. अब तक वहां काफी भीड़ जमा हो चुकी थी. पुलिस लाश की जांच करने में लग गई, तभी मौका पा कर कुलदीप कौर फरार हो गई.
लाश अभी तक पूरी तरह सड़ी नहीं थी, पर सड़ने जरूर लगी थी. मृतक काला के पेट में एक गहरा सुराख था, जिस में से खून निकल कर जम कर काला पड़ चुका था. घटनास्थल की सारी काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया गया.
पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, काला के पेट में कोई तेजधार वाली नुकीली चीज घुसेड़ कर घुमाई गई थी, जिस से नाभि चक्र एवं आंतें कट गई थीं. इसी वजह से उस की मौत हो गई थी. अजायब सिंह की तहरीर पर काला की हत्या का मुकदमा दर्ज कर पुलिस कुलदीप कौर की तलाश में जुट गई. उस के मायके में छापा मारा गया, पर वह वहां नहीं मिली.
कुलदीप कौर की गिरफ्तारी और हत्या का रहस्य 
आखिर 6 मार्च, 2017 को मुखबिर की सूचना पर उसे पटियाला जाने वाली सड़क पर बने बसअड्डे से गिरफ्तार कर लिया गया. थाने ला कर कुलदीप कौर से पूछताछ की गई तो उस ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए काला की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह संदेह में उपजी हत्या की कहानी थी.
दरअसल, काला शरीफ, ईमानदार होने के साथसाथ हंसमुख और मिलनसार भी था. दूसरों के दुखदर्द को समझना, लोगों की मदद करना और सब से हंसहंस कर बोलना उस के स्वभाव में था. उस के इसी स्वभाव से कुलदीप कौर को जलन होती थी. यही नहीं, वह उसे गलत भी समझती थी.
इन्हीं छोटीछोटी बातों को ले कर काला और कुलदीप कौर में लड़ाईझगड़ा ही नहीं, मारपीट भी हो जाती थी. मामला शांत होने पर काला कुलदीप कौर को प्यार से समझाता था कि वह बेकार ही उस पर शक करती है.
नवनीत सिंह उर्फ काला पत्नी के इस शक से काफी डरता था. उसे अपने बच्चों के भविष्य की चिंता थी. गलीपड़ोस की औरतों को ले कर ही नहीं, कुलदीप कौर अपनी जेठानी को ले कर भी संदेह करती थी. पहले तो काला यह सब बरदाश्त करता रहा, पर जब उस ने उस के संबंध जेठानी से होने की बात कही तो काला बरदाश्त नहीं कर सका.
दरअसल, काला भाभी को मां की तरह मानता था. वह भाभी की बड़ी इज्जत करता था. जबकि कुलदीप कौर उस के पवित्र रिश्ते को तारतार करने पर तुली थी. काला ने उसे न जाने कितनी बार समझाया, पर वह अपनी आदत से मजबूर थी. उस के दिमाग की गंदगी निकल ही नहीं रही थी. काला के समझाने का उस पर कोई असर नहीं पड़ रहा था. जब देखो, तब वह काला को जेठानी के साथ जोड़ बुराभला कहती रहती थी.
कुलदीप कौर काला पर इस बात के लिए भी दबाव डालती रहती थी कि वह अपने भाई और पिता से मिलने उन के घर न जाए. जबकि काला पिता और भाइयों को नहीं छोड़ना चाहता था. कुलदीप कौर ने उसे कई बार धमकी दी थी कि अगर उस ने उस की बात नहीं मानी तो वह उसे छोड़ कर चली जाएगी या फिर वह उसे ऐसा सबक सिखाएगी कि वह भूल नहीं पाएगा.
कुलदीप कौर ने जब देखा कि काला उस की बात नहीं मान रहा है और पिता तथा भाइयों से मिलने जाता है तो उस ने काला को ही ठिकाने लगाने का फैसला कर लिया. 12 मार्च की रात उस ने काला के खाने में नींद की गोलियां मिला दीं. खाना खा कर काला गहरी नींद सो गया तो कुलदीप कौर ने बर्फ तोड़ने वाला सूजा पूरी ताकत से काला के पेट में घुसेड़ कर तेजी से चारों ओर कई बार घुमा दिया, जिस से उस की मौत हो गई.
काला को मौत के घाट उतार कर कुलदीप कौर उस की लाश को घसीट कर रसोईघर में ले गई और उसे वहां वैसे ही छोड़ दिया. अगले दिन वह रोज की तरह सामान्य रूप से अपने काम करती रही. उस ने काला का फोन भी बंद कर दिया था. इस बीच उस ने बच्चों को रसोईघर में नहीं जाने दिया.
रातदिन कुलदीप कौर लाश को ठिकाने लगाने के बारे में सोचती रही, पर उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह लाश को कहां ले जाए. अंत में लोग जब काले को तलाशते उस के घर पहुंचे तो उस की हत्या का राज खुल गया.
6 मार्च, 2017 को थानाप्रभारी जसविंदर सिंह टिवाणा ने कुलदीप कौर को अदालत में पेश कर एक दिन के रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि में काला की हत्या में प्रयुक्त बर्फ तोड़ने वाला सूजा कुलदीप कौर की निशानदेही पर बरामद कर लिया गया. इस के बाद रिमांड अवधि समाप्त होने पर उसे पुन: अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया.     
कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित
-साहिल कपूर 


रविवार, 31 मार्च 2019

इंसानियत को सलाम

इंसानियत को सलाम

समरीन की दोनों किडनियां फेल हो चुकी हैं और उनके परिवार ने उन्हें किडनी दान देने का फैसला लिया,लेकिन किसी की किडनी उनसे मैच नहीं हुई. वहीं मनजोत ने अपनी सहेली को अपनी एक किडनी देने का फैसला किया लेकिन मनजीत के इस फैसले के आड़े उसके अपने पिता आगये है. मामला अदालत में पहुंच गया.  मनजोत ने कहा कि वो अपने परिवार की बात समझती हैलेकिन सभी को इन सबसे ऊपर उठना होगा. मैं उन्हें गलत नहीं कह रही. उनके नजरिये से वो सही हैंलेकिन हमें इन भावनाओं से ऊपर उठना चाहिए और वो करना चाहिए जिसके लिए परमात्मा ने हमें इस संसार में भेजा है.

मानवता की मिसाल मनजोत कोहली 
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हाभारत काल में दुर्योधन और करण की मित्रता एक मिसाल थी. दोस्ती के लिए कुछ लोग जाति-धर्म और सरहद को भी लांघ देते हैं. ऐसे लोग मदद करते हुए समय नहीं देखते हैं बस मदद करते हैं. ऐसे लोग समाज के लिए मिसाल बन जाते हैं. उनके किस्से लोगों के बीच सुनाए जाते हैं. उनकी दोस्ती की चर्चा होती है.
जिस कश्मीर में अलगाववादी हिंदू-मुस्लिमों के बीच दरार डालने में लगी हैं. वहींएक हिंदू बेटी मुस्लिम सहेली की जान बचाने के लिए उसे अपनी एक किडनी देगी. जम्मू के ऊधमपुर जिले के सब्जी मंडी इलाके में रहने वाली 23 वर्षीय मनजोत कोहली राजौरी जिले के जवाहर नगर निवासी अपनी मुस्लिम सहेली 22 वर्षीय समरीन अख्तर को किडनी देगी. मनजोत पिछले कई वर्षो से समाज सेविका के तौर पर काम कर रही है. मगर अब वह समाज सेवा के क्षेत्र में उन सभी से आगे निकल गई हैजो अपने स्वार्थ सिद्ध करने के लिए समाज सेवी संगठन बनाते हैंऔर सरकार से धन प्राप्त कर अपने सुख साधनों पर खर्च करते है.

जम्मू कश्मीर में एक सिख परिवार की महिला ने अपनी एक किडनी अपनी एक मुस्लिम सहेली को दान देने की इच्छा जताई थीजिसके बाद उसके विकलांग पिता ने अपनी बेटी से उसकी चिकित्सीय हालत को ध्यान में रखते हुए फैसले पर ‘‘पुनर्विचार’’ करने की अपील की है और इस मामले में राज्यपाल से भी हस्तक्षेप की गुहार लगाई है. सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ता मन्जोत कोहली  ने हाल ही में राजौरी  जिले की अपनी 22 वर्षीय मुस्लिम दोस्त समरीन अख्तर को एक किडनी दान देने का फैसला सार्वजनिक किया थालेकिन साथ ही कहा कि उसके परिवार को इस पर आपत्ति है और श्रीनगर का एक अस्पताल इस प्रक्रिया में देरी कर रहा है.
मन्जोत के पिता गुरदीप सिंह 75 प्रतिशत तक विकलांग हैं और वह चलने में असमर्थ हैंउन्होंने उधमपुर स्थित अपने आवास पर पत्रकारों से कहा, ‘‘मैं हाथ जोड़कर अपनी बेटी से मुझे परेशानी से राहत दिलाने के लिए इस योजना को छोड़ने का अनुरोध करता हूं जैसा कि आपको मेरी चिकित्सीय हाल के बारे में पता है और उसके बाद कोई भी मेरी देखभाल करने वाला नहीं है।’’ उन्होंने सौरा के शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एसकेआईएमएस) को पहले ही एक नोटिस भेजा है जिसमें अपनी बेटी के फैसले का विरोध करते हुए कहा है.
समरीनाअख्तर 
‘‘इस मामले में परिवार की सहमति नहीं है.’’
 मंजोत ने कहा कि वो अपने परिवार की बात समझती हैलेकिन सभी को इन सबसे ऊपर उठना होगा. मैं उन्हें गलत नहीं कह रही. उनके नजरिये से वो सही हैंलेकिन हमें इन भावनाओं से ऊपर उठना चाहिए और वो करना चाहिए जिसके लिए परमात्मा ने हमें इस संसार में भेजा है.

समरीन की दोनों किडनियां फेल हो चुकी हैं और उनके परिवार ने उन्हें किडनी दान देने का फैसला लियालेकिन किसी की किडनी उनसे मैच नहीं हुई. वहीं उनकी मां की किडनी मैच हुईलेकिन उनकी सेहत को देखते हुए डॉक्टर्स ने उनकी किडनी लेने से इनकार कर दिया. समरीन का परिवार जब सारी उम्मीदें हार गयातब मंजोत किसी फरिश्ते की तरह उनकी जिंदगी में आईं. मनजोत ने समरीन को अपनी किडनी देने का फैसला लिया है और उनकी किडनी भी समरीन से मैच कर गई है,
मनजीत के परिवार की विवशता 
मनजोत सिंह के माता-पिता के साथ 2014 में एक दुर्घटना हुई थी जिसमें उसकी मां की मौत हो गई जबकि पिता को गंभीर चोटें आई और उनका एक मेजर  ऑपरेशन हुआ. गुरदीप सिंह ने कहा, ‘‘मुझ पर रहम करो और वापस लौट आओ. तुम कुछ अच्छा नहीं कर रही हो क्योंकि तुम्हारे पापा को तुम्हारी जरुरत हैमेरी देखभाल करने के लिए और कौन है यहां. मैं इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर सकता.’’ उन्होंने अपनी बेटी की जान बचाने के लिए इस मामले में राज्यपाल सत्यपाल मलिक से भी हस्तक्षेप करने की अपील की है.
उन्होंने रोते हुए कहा कि उनका इकलौता बेटा दिल्ली में काम कर रहा है और उन्होंने अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए हरसंभव कोशिश की. उन्होंने कहा, ‘‘मैंने उसे अच्छी शिक्षा दी और उसे हिमाचल प्रदेश के उस स्कूल में पढ़ाया जहां बॉलीवुड की कई अभिनेत्रियों ने पढ़ाई की है. जब अख्तर की मां किडनी देने के लिए चिकित्सीय रूप से फिट है तो वे मेरी बेटी को मजबूर क्यों कर रहे हैं.’’
गुरदीप सिंह ने बताया कि उनकी बेटी करीब नौ महीने पहले घर से चली गई थी और उसने एक इंस्टीट्यूट खोल लिया. बेटी ने उनसे कहा कि वह श्रीनगर में तीन महीने के कोर्स के लिए जा रही है. उन्होंने कहा, ‘‘दस नवंबर को वह अपनी दोस्त के साथ आई और मुझे बताया कि वह अपनी किडनी उसे दान देना चाहती है. जब उसकी दोस्त चली गई तो मैंने इसका विरोध किया. वह जो कर रही है वह गैरकानूनी है क्योंकि वह खून के रिश्ते के अलावा किसी और को किडनी दान नहीं दे सकती.’’ उन्होंने इसे बेवजह महान बनने और लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने वाला कदम बताया.
उन्होंने कहा कि लोग उनकी बेटी के फैसले का स्वागत कर रहे हैं जबकि ‘‘मैं जानता हूं कि यह कुछ समय के लिए है और किडनी दान देने के बाद कोई उसे पूछेगा तक नहीं. वे कुछ समय तक उसकी देखभाल करेंगे और फिर....। वह युवा है और मेरी इच्छा उसकी शादी करने की है. किडनी दान देने के बाद कोई उससे शादी नहीं करेगा.’’ दूसरी ओरमनजोत ने कहा था, ‘‘हम पिछले चार साल से दोस्त हैं और मैं भावनात्मक रूप से उससे जुड़ी हूंसाथ ही मेरा इंसानियत में भी पूरा भरोसा है जो मुझे मेरी किडनी दान करने के लिए प्रेरित कर रहा हैं’’
उसने कहा कि अख्तर पिछले कई वर्षों से जम्मू में उसके साथ कई सामाजिक कार्यों में शामिल रही है. उसने कहा, ‘‘लेकिन अख्तर ने कभी मुझे अपनी बीमारी के बारे में नहीं बताया और मुझे एक दोस्त के जरिए यह बात पता चली थी. वह मेरी दोस्त रही है और मुश्किल वक्त में मेरे साथ रही हैमैंने उसे जरुरत पड़ने पर अपनी एक किडनी दान देने का फैसला किया है.’’ मंजीत कोहली अपने घर वालो के खिलाफ कोर्ट पहुँच गयीहै. उसने कोर्ट के समक्ष कहा कि वह अपनी सहेली समरीन अख्तर की जान बचाना चाहती है और इसके लिए वह अपनी एक किडनी उसे दान देना चाहती है. अभी मामला कोर्ट में है लेकिन मंजीत कोहली को उम्मीद है कि कोर्ट उसे इस नेक काम से कभी नहीं रोकेगाबल्कि उसकी भावनाओं को समझते हुए उसका सहयोग करेगा.

शनिवार, 30 मार्च 2019

माँ की हवस का शिकार बनी सोनम


    माँ की हवस का शिकार बनी सोनम

सोनम की माँ लक्ष्मी 
आठ वर्ष पहले अपने पति से अलग होने के बाद लक्ष्मी ने सदर बज़ार के रघुनाथ मंदिर के पास किराये के मकान में जब रहना शुरू तब उसकी मुलाकात अमित नामक व्यक्ति से हुई. अमित भी उसी मोहल्ले का रहने वाला था. वह शादीशुदा था और उसके तीन बच्चे भी थे. अमित का छोटा सा ठेकेदारी का काम था. वह बीमार मरीजों की देखभाल के लिए काम वालियां उपलब्ध करवाया करता था.लक्ष्मी को भी उसीने काम पर लगवाया था, इसी कारण उसका लक्ष्मी के घर आना-जाना बन गया था. लक्ष्मी अपने पति से अलग अकेली रहती थी, उसे भी किसी सहारे, खासकर पुरुष के सहारे की जरूरत थी. सो दोनों के बीच पहले दोस्ती बनी और फिर जल्दी ही वह रिश्ता बन गया जिसे हमारे समाज में नाजायज़ कहा जाता है. 

बाज़ार से सामान लेकर जब लक्ष्मी वापिस अपने घर लौटी तो उसकी बेटी 10 वर्षीय सोनम घर पर नहीं थी. घर के दरवाजे खुले हुए थे और कमरे में टीवी चल रहा था. अपने आपसे बडबडाते हुए उसने कहा, ‘’लापरवाही की भी हद है, सारा घर खुला छोड़ ना जाने कहाँ चली गई है साहबजादी.’’ घरेलू सामान रसोई में रख सबसे पहले उसने कमरे में चल रहा टीवी बंद किया और उसके बाद वह सोनम की तलाश में घर के बाहर निकल गई. उसने अड़ोस-पड़ोस से लेकर पूरे मोहल्ले में सोनम की तलाश की पर उसका कहीं पता नहीं चला था. सोनम को ढूंढते रात हो चली थी. मोहल्ले वालों के अनुसार भी उन्होंने सोनम को घर या घर के आसपास कहीं नहीं देखा था. जमाना खराब है, यह सोचकर अब लक्ष्मी का चिंतित होना भी  लाज़मी था. अचानक उसे ध्यान आया कि कहीं सोनम उसे बिना बताये अपने पिता और दादी के घर ना चली गई हो. ऐसा वह पहले भी कर चुकी थी. यह सोचकर वह सोनम का पता लगाने धक्का बस्ती की ओर चल पड़ी. यह बात 19 जनवरी 2019 की है.
लक्ष्मी का ग्रहस्थ जीवन 
लक्ष्मी की शादी आज से लगभग 15 वर्ष पहले धक्का बस्ती करनाल निवासी दिलावर के साथ हुई थी. शादी के बाद उनकी दो संताने हुई. 13 वर्षीय पुत्र सुशील और 10 वर्षीय पुत्री सोनम. शादी के लगभग 5-6 वर्षों बाद पति-पत्नी के बीच छोटी-छोटी बातों को लेकर झगड़े होने लगे थे. झगड़े की वजह किया रही थी यह बता पाना मुश्किल है. धीरे-धीरे नौबत यहाँ तक आगई कि दोनों का एक साथ रहना सम्भव नहीं रहा और आज से लगभग 8 साल पहले सन 2000 में दोनों पति-पत्नी अलग हो गए थे. लक्ष्मी ने करनाल के थाना सदर क्षेत्र में रघुनाथ मन्दिर के पास किराये का मकान लेकर अलग रहना शुरू कर दिया था. सुशील और सोनम दोनों बच्चे अपने पिता और दादी के पास धक्का बस्ती में ही रहते थे. धक्का बस्ती जाकर लक्ष्मी को पता चला कि सोनम वहां नहीं आई थी. सोनम ना घर पर थी और ना दादा-दादी के पास तो आखिर वह गई कहा.? इस मामले में लक्ष्मी ने अब और समय व्यर्थ करना उचित नहीं समझा और समझदारी दिखाते हुए दिनांक 16 को थाना सदर अंतर्गत आती पुलिस चौकी की में जाकर सोनम के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज करवा दी. नाबालिक सोनम चौथी कक्षा की छात्रा थी, इसलिए मामले की गम्भीरता को देखते हुए चौकी इंचार्ज ने थाना सदर एसएचओ मनोज को इस बात की सूचना देने के पश्चात सोनम की तलाश शुरू कर दी थी. सोनम को तलाशने में सदर थाना पुलिस ने हर संभव प्रयास किया था. लेकिन सोनम के लापता होने के 15 दिन बीत जाने के बाद भी वह सोनम को तलाशने में असफल रही थी. 
पुलिस हिरासत में आरोपी 
स बीच लक्ष्मी ने पुलिस के सामने अपनी शंका व्यक्त की कि शायद सोनम के लापता होने के पीछे उसकी दादी और पिता का हाथ हो सकता है. पुलिस इस मामले में अभी छानबीन कर ही रही थी कि दिनांक-29 फरवरी को पश्चमी यमुना नहर में हांसी रोड कच्छवा पुल के पास प्लास्टिक के कट्टे में बंद एक लावारिस लाश पड़ी मिली थी. लाश को वहां पर खेल रहे कुछ बच्चों ने देखा था. उन्होंनें ही शोर मचाकर लोगों को इकट्ठा किया था और फिर पुलिस को सूचना दी गई थी.
लापता होने की रिपोर्ट और पुलिस तहकीकात 
सूचना मिलते ही थाना सिटी करनाल इंचार्ज इं हरजिंदर सिंह दलबल सहित घटनास्थल यमुना नहर पर पहुँच गए थे. पुलिसकर्मीयों की मदद से कट्टे को खोलकर देखा गया. लाश किसी नाबालिग बच्ची की थी जो काफी हद तक सड़ चुकी थी. अनुमान लगाया गया कि लाश काफी दिनों से वहां पड़ी हो सकती थी. इं हरजिन्दर सिंह ने क्राईम टीम सहित एफएसएल की टीम को भी मौका पर बुला लिया गया था. लाश के पंचनामा की वीडियोग्राफी कर अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा अपराध संख्या-049/2019 पर हत्या की धरा 302 के अंतर्गत दर्ज कर बाडी को पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दिया. लावारिस लाश किसकी थी,? उसकी शिनाख्त करना सबसे अहम् काम था. तभी जाकर हत्या और हत्या के कारणों तक पहुंचा जा सकता था. सो इं हरजिन्दर सिंह ने लाश की शिनाख्त के लिए मृतका के पोस्टर बनवाकर शहर के सार्वजनिक स्थानों पर लगवा कर शिनाख्त की अपील की. इस के आलावा उन्होंने करनाल सहित आसपास क्षेत्रों के थानों से पिछले महीने की दर्ज मिसिंग लोगों की रिपोर्ट मंगवा ली.
इंस्पेक्टर हरजिंदर सिंह और सहायक 
स बीच पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आ गई थी. रिपोर्ट के अनुसार मृतका बच्ची की उम्र 8 से लेकर 10 वर्ष के बीच थी और उसकी हत्या किसी चीज से गला दबाकर की गई थी. शिनाख्त छिपाने के लिए उसके चेहरे को जलाने की भी कोशिश की गई थी. हत्या लगभग 17-18 दिन पहले की गई थी. इं हरजिन्दर सिंह ने जब पिछले महीने के लापता लोगों की जब लिस्ट खंगाली तो एक मिसिंग रिपोर्ट पर उनकी नज़र ठहर गई. यह थाना सदर क्षेत्र से लापता हुई एक सोनम नामक 10 वर्षीय बच्ची का मामला था जो अभी तक अंट्रेस था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार लावारिस मिली लाश मे मृतका की आयु भी लगभग 10 वर्ष थी, सो इं हरजिंदर सिंह ने थाना सदर पुलिस से फाईल मंगवाकर जांच शुरू कर दी. सोनम की गुमशुदगी उसकी माँ लक्ष्मी ने दर्ज करवाई थी. इं हरजिंदर सिंह ने लक्ष्मी को मोर्चरी में बुलवाकर लाश की जब शिनाख्त करवाई तो उसने लाश पहचानते हुए बताया कि वह उसी की लापता बेटी सोनम की लाश थी. पूछताछ के दौरान लक्ष्मी ने बताया कि सोनम के स्कूल की उन दिनों छुटियाँ थी, उसके स्कूल 15 तारीख़ को खुलने थे इसलिए कुछ दिन अपनी मौसी के घर रहने के बाद वह उसके घर रहने आई थी जहाँ से वह लापता हो गई थी. लक्ष्मी ने यह भी बताया कि उसकी किसी से दुश्मनी या कोई लेने-देने का झगड़ा नहीं है, हाँ इस मामले में उसने अपने पति दिलावर पर अपना शक जताया था. उसका पिता दिलावर अपनी ही बेटी की हत्या क्यों करेगा,? इस बारे में वह कुछ नहीं बता पाई थी फिर भी इं हरजिंदर सिंह ने दिलावर को थाने बुलवाकर पूछताछ की पर वह निर्दोष साबित हुआ. उसका इस मामले से कोई लेनादेना नहीं था. 
एसपी  सिटी करनाल  
इं हरजिंदर सिंह ने लक्ष्मी की  ससुराल धक्का बस्ती और हालमें जहाँ वह रहती थी के आसपड़ोस से पूछताछ करवाई तो कई चौंकाने वाली बातें पता चली. उन्होंने लक्ष्मी में दोबारा पूछताछ करने के बाद सोनम की गुमशुदगी में दर्ज बयानों और उसके द्वारा दिए बयानों का बारीकी से निरिक्षण किया तो उन में काफी अंतर था. इसके आलावा लक्ष्मी बार-बार अपना ब्यान भी बदलती रही थी. इं हरजिंदर को साफ लग रहा था कि सोनम के मामले में लक्ष्मी का कहीं न कहीं कोई हाथ जरूर है पर उनके पास कोई पुख्ता सबूत ना होने के कारण उन्होंने उससे अभी कुछ कहना उचित नहीं समझा. इस दौरान पुलिसकर्मी लक्ष्मी पर बराबर अपनी नजर रखे हुए थे.
पुलिस कैसे पहुंची हत्यारों तक 
इं हरजिंदर ने लक्ष्मी के घर के पास के सारे सीसीटीवी फुटेज निकलवा कर जब चेक किये तो दिनांक 10 जनवरी के फुटेज में लक्ष्मी किसी युवक के साथ बाईक पर एक कट्टा रख कहीं जाती हुई नज़र आई, उन्होंने लाश से बरामद कट्टा और बाईक पर लेजाने वाला कट्टा चेक किया तो दोनों कट्टों पर एक ही मार्का लगा हुआ था. सोनम की गुमशुदगी की रिपोर्ट थाना सदर में लक्ष्मी ने दिनांक-16 जनवरी को दर्ज करवाई थी और फुटेज में वह 10 जनवरी की रात कट्टा लेकर जाती दिखाई दी थी जबकि यमुना नहर से कट्टे में बंद लाश 29 फरवरी को इन दोनों घटनाओं के 18 दिन बाद बरामद की गई थी. तो क्या सोनम की हत्या 10 जनवरी को करने के बाद 16 तारीख को उसके लापता होने की रिपोर्ट दर्ज करवाई गई थी. अब शक की कोई गुंजायश नहीं रही थी. इं हरजिंदर सिंह ने लक्ष्मी को हिरासत में लेकर जब पूछताछ तो वह तरह-तरह की कहानियां सुनाने लगी. जब उसे लेडी कांस्टेबल के हवाले किया गया तो उसने अपनी ज़ुबान खोलते हुए बताया कि उसी ने अपने प्रेमी अमित के साथ मिलकर सोनम की हत्या की थी. लक्ष्मी की निशानदेही पर सदर बाज़ार निवासी उसके प्रेमी अमित को भी गिरफ्तार कर दिनांक 1 फरवरी को अदालत में पेश कर दो दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया. रिमांड के दौरान हुई पूछताछ में सोनम के लापता होने से लेकर उसकी हत्या होने की कहानी इस प्रकार है.
लक्ष्मी के अवैध सम्बन्धऔर सोनम की हत्या का रहस्य  
ठ वर्ष पहले अपने पति से अलग होने के बाद लक्ष्मी ने सदर बज़ार के रघुनाथ मंदिर के पास किराये के मकान में जब रहना शुरू तब उसकी मुलाकात अमित नामक व्यक्ति से हुई. अमित भी उसी मोहल्ले का रहने वाला था. वह शादीशुदा था और उसके तीन बच्चे भी थे. अमित का छोटा सा ठेकेदारी का काम था. वह बीमार मरीजों की देखभाल के लिए काम वालियां उपलब्ध करवाया करता था .लक्ष्मी को भी उसीने काम पर लगवाया था, इसी कारण उसका लक्ष्मी के घर आना-जाना बन गया था. लक्ष्मी अपने पति से अलग अकेली रहती थी, उसे भी किसी सहारे, खासकर पुरुष के सहारे की जरूरत थी. सो दोनों के बीच पहले दोस्ती बनी और फिर जल्दी ही वह रिश्ता बन गया जिसे हमारे समाज में नाजायज़ कहा जाता है. अमित लक्ष्मी की शारीरिक जरूरतों के अलावा वह सब जरूरतें पूरी करने लगा जिसकी लक्ष्मी ने तमन्ना की थी. दोनों के बीच सब ठीकठाक ही चल रहा था. किसी को इस बात की भनक तक ना थी.
सोनम की हत्या,क्यों-कैसे 
दिनांक 10 जनवरी के दिन लक्ष्मी का मालिक मकान वैष्णों देवी की यात्रा पर जम्मू गया हुआ था और उन दिनों लक्ष्मी की बेटी सोनम स्कूल की छुट्टियाँ होने के कारण अपनी माँ के घर रहने आई हुई थी. उसी शाम अमित भी लक्ष्मी को मिलने उसके घर आ पहुंचा था. अमित को आया देख लक्ष्मी ने सोनम को कुछ पैसे देते हुए कहा की वह बाज़ार जाकर घूमफिर आये. सोनम बड़ी समझदार और होशियार बच्ची थी. अमित के आते माँ का इस तरह अचानक उसे बज़ार भेजना समझ ना आया. वह माँ से पैसे लेकर कमरे से बाहर तो निकल आई पर बाज़ार जाने की बजाय वह छत पर चली गई, कुछ समय बाद जब वापिस नीचे आकर उसने देखा तो पाया कि मकान का मुख्य द्वार बंद पाया था और माँ जिस कमरे में थी उसमें से माँ और अमित के हंसने- खिलखिलाने की आवाजें आ रही थी. लक्ष्मी के कमरे का दरवाज़ा खुला हुआ था. क्योंकि सोनम को बाज़ार भेजने के बाद लक्ष्मी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि वह बाज़ार नहीं गई थी. बेपरवाही से वे दोनों अपनी हवस का खेल,खेल रहे थे की अचानक से सोनम ने कमरे में प्रवेश कर उन्हें चौंका दिया था. दोनों की चोरी रंगे हाथों पकड़ी गई थी. उनका भंडा फूट चूका था और वे दोनों बुरी तरह से डर गये थे. सोनम ने अपनी माँ लक्ष्मी को धमकी देते हुए कहा था.
‘’ तुम्हारी इस करतूत को मैं पापा और दादी को बताउंगी कि उनसे अलग रहकर तुम यहाँ क्या गुल खिला रही हो.’’
मित और लक्ष्मी ने सोनम को अपने विश्वास में लेकर काफी समझाने का प्रयास किया और उसे रुपयों का लालच भी दिया. पर सोनम अपनी बात पर अड़ी रही थी. सोनम की जिद को देखते हुए और समाज के डर से बचने के लिए उन दोनों ने सोनम को ही हमेशा के लिए चुप कर देने का फैसला लेते हुए उसकी गला दबाकर हत्या कर दी थी. उसी के पहने स्वेटर को उतार कर उसके गले में कस दिया गया था.
सोनम की हत्या करने के पश्चात अमित बाहर जाकर दुकान से बड़ा सा खाली कट्टा खरीद लाया और दोनों ने कट्टे में सोनम की लाश को भरकर बाईक द्वारा यमुना नदी में फेंक दिया था. जिस समय उन्होंने लाश फेंकी थी उस समय नहर में पानी था. उन्होंने सोचा था कि लाश पानी में बहकर दूर चली जाएगी पर अगले दिन ही नहर में पानी का बहाव कम हो गया था और लाश कुछ आगे जाकर रुक गई थी और पूरे 19 दिन तक एक ही जगह पर पड़ी रही थी. सोनम की लस्क ठिकाने लगाने के एक सप्ताह बाद लक्ष्मी ने सोनम की गुमशुदगी थाने में इस लिए दर्ज करवाई थी कि उसके स्कूल की छुट्टियाँ खत्म होने वाली थी. सोनम के स्कूल ना जाने के कारण लोग उससे पूछ सकते थे इसलिए उसने सोनम के लापता होने की रिपोर्ट लिखवाकर यह ड्रामा रचा था जिसे इं हरजिंदर सिंह अपनी सूझबूझ से नाकाम कर दिया था.
रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद अमित और लक्ष्मी को सोनम की हत्या के आरोप में पुनः अदालत में पेशकर जिला जेल भेज दिया गया.
( पुलिस सूत्रों पर आधारित कथा )
-साहिल कपूर